Monday, 4 June 2018

ज़िंदगी की हक़ीकत से दो चार हो


एक हम थे के अश्क बहाने मैं रह गय


ये दर्द ही तो उसकी आखरी निशानी


किसी से दिल न्ही मिलता तो कोई दिल


ये दर्द मोहब्बत को निभाने की सज़ा